भारतीय मानव संस्कृति के उत्थान और विकास में दवा और अध्यात्म का तालमेल वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांतों पर: भाई महेंद्र
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय चिकत्सा और ध्यान: मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिकता सम्मेलन एम्स में -दुनियाभर के विभिन्न पद्धतियों के वैज्ञानिकों ने लिया भाग, साझा किया मंच
नई दिल्ली नई उड़ान (ट्रस्ट) एवं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सयुक्त तत्वाधान में जवाहर लाल नेहरू आडिटोरियम में
चिकित्सा और ध्यान: मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिकता के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल को उन्नत करना थीम पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन प्रारंभ हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए श्रीरामचंद्र मिशन के अध्यक्ष पद्मा विभुषन अवार्डी एवं अंतरराष्ट्रीय अध्यात्मिक गुरु दाजी महाराज ने विभिन्न पद्धतियों से वैज्ञानिकों द्वारा मानव कल्याण के लिए किए जा रहे शोध की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि व्यक्ति जिसका जन्म हुआ है उसे प्राकृतिक नियमों का अनुशरण करना चाहिए। भौतिकवादी वस्तुओं के प्रति ज्यादा प्रेम उसके विकास की गति को धीमा कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि पाश्चात्य संस्कृति, सनातनी मूल्यों को आधार मानकर अपने कायरे को सफलता की श्रेणी पर ले जाएं।
इस मौके पर एम्स के निदेशक डा. एम श्रीनिवास, सम्मेलन की चेयरपर्सन एवं डिपार्टमेंट आफ फीजियोलॉजी की अध्यक्ष डा.केपी कोछड़, केंद्रीय संस्कृति एवं विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी, भाजपा के प्रवक्ता डा.सुधांशु त्रिवेदी , कैलीफरेनिया विविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. वैरी कर्जन, इंडियन अमरीकन अर्थर एंड अल्टरनेटिव मेडिसिन एडवोकेट डा. दीपक चोपड़ा, अखिल भारतीय आयुव्रेद संस्थान की निदेशक डा. तनुजा नेसारी ने एक छत के नीचे मार्डन साईस और आयुव्रेद, होम्योपैथ, मेडिटेशन, योगिक क्रियाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। मंच का संचालन डा. विवेक दीक्षित ने किया। कार्यक्रम में पूर्व मैट्रोपैलोटिन मजिस्ट्रेट एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्त हरीश मखीजा ने बतौर विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रहे
वसुधैव कुटुंबकम्: अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाई महेंद्र ने कहा कि वसुधैव कु टुंबकम् के महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक व्यवस्थित रूप हमें सर्वप्रथम वैदिक युग में प्राप्त होता है। वेद वि के प्राचीनतम् ग्रंथ माने जाते हैं। प्रारंभ से ही भारतीय संस्कृति अत्यंत उदात्त, समन्वयवादी, सशक्त एवं जीवंत रही हैं, जिसमें जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आध्यात्मिक प्रवृत्ति का अद्भुत समन्वय पाया जाता है। रावत ने कहा भारतीय विचारक आदिकाल से ही संपूर्ण वि को एक परिवार के रूप में मानते रहे हैं इसका कारण उनका उदार दृष्टिकोण है।हमारे विचारकों की ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत में गहरी आस्था रही है। ववस्तुत: शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का विकास ही संस्कृति की कसौटी है। इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति पूर्ण रूप से उतरती है। प्राचीन भारत में शारीरिक विकास के लिए व्यायाम, यम, नियम, प्राणायाम, आसन ब्रह्मचर्य आदि के द्वारा शरीर को पुष्ट किया जाता था । लोग दीर्घ जीवी होते थे।
आश्रम व्यवस्था:
रावत ने आश्रम व्यवस्ता के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आश्रम व्यवस्था का पालन करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है। प्राचीन भारत के धर्म, दर्शन, शास्त्र, विद्या, कला, साहित्य, राजनीति, समाजशास्त्र इत्यादि में भारतीय संस्कृति के सच्चे स्वरु प को देखा जा सकता है। वहीं, उन्होंने कि मानव संस्कृति यह संस्कृति ऐसे सिद्धांतों पर आश्रित है जो प्राचीन होते हुए भी नए हैं। ये सिद्धांत किसी देश या जाति के लिये नहीं अपितु समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये हैं। इस दृष्टि से भारतीय संस्कृति को सच्चे अर्थ में मानव संस्कृति कहा जा सकता है। मानवता के सिद्धांतों पर स्थित होने के कारण ही तमाम आघातों के बावजूद भी यह संस्कृति अपने अस्तित्व को सुरक्षित रख सकी है। यूनानी, पार्शियन, शक आदि विदेशी जातियों के हमले, मुगलों और अंग्रेजी साम्राज्यों के आघातों के बीच भी यह संस्कृति नष्ट नहीं हुई। अपितु प्राणशीलता के अपने स्वभावगत गुण के कारण और अधिक पुष्ट एवं समृद्ध हुई। नई उड़ान ट्रस्ट (नट) के संस्थापक अध्यक्ष भाई महेंद्र ने आए अतिथियों का स्वागत किया। स्मृति चिह्न और फटका, पौधा और तीन पुस्तकें भेंट कर किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में उत्कृष्ठ प्रदर्शन करने वाले रेशलर भाई रमेश पहलवान एवं नई उड़ान के मीडिया प्रभारी श्री राजेश सिंह जी भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मेलन देश के लोगों के स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।
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